पढ़ेगा इंडिया, तो विश्व गुरू कैसे बनेगा इंडिया!
आलेख : संजय पराते
कभी-कभी कोई विधायक जाने-अनजाने ही सही, विधानसभा में सरकार से ऐसे सवाल पूछ बैठते हैं, जो सरकार के विकास के दावों की पूरी पोल-पट्टी खोल देते हैं। ऐसे ही एक विधायक है मध्यप्रदेश के सरदारपुर विधानसभा क्षेत्र से प्रताप ग्रेवाल, जो सदन में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हैं। वैसे छत्तीसगढ़ का अनुभव बताता है कि कांग्रेस यदि सत्ता में हो, तो पूरी ईमानदारी के साथ भाजपा के नक्शे-कदम चलती है। लेकिन कांग्रेस के सभी जनप्रतिनिधियों को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता और ज्यादा संभावना इसी बात की है कि उन्होंने ये सवाल भाजपा की किरकिरी करने के लिए ही पूछा हो। स्कूली शिक्षा के बारे में उन्होंने जो सवाल पूछा और भाजपा सरकार की ओर से जो जवाब आया, भाजपा और उसकी सरकार ने शिक्षा क्षेत्र की जो मिट्टी-पलीद की है, वह दिखाने के लिए काफी है।
मध्यप्रदेश में स्कूली शिक्षा की जो दुर्दशा है, उसके लिए भाजपा सरकार के पास कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने का कोई मौका नहीं है, क्योंकि कुछ अरसे के व्यवधान को छोड़कर वर्ष 2003 से भाजपा लगातार सत्ता में है। 2014 से उसके साथ केंद्र की ताकत भी जुड़ गई है और यह संभावित तर्क भी वह नहीं दे सकती कि केंद्र ने राज्य के साथ सहयोग नहीं किया है। विधानसभा में सरकार ने जो चौंकाने वाली जानकारी दी है, उसके अनुसार :
1. प्रदेश में एक दशक पहले जहां 1,14,972 स्कूल थे, आज घटकर 82,128 रह गये हैं यानी 32,844 स्कूलों (28.56 प्रतिशत) पर ताला लग गया है।
2. स्कूलों की संख्या घट गई, तो शिक्षकों की संख्या भी घटनी ही थी। 2014-15 में प्रदेश में जहां 2,91,992 शिक्षक हुआ करते थे, वहीं आज ये संख्या घटकर 2,33,817 रह गई है -- यानी पिछले एक दशक में 61,175 स्कूली शिक्षक (20.95 प्रतिशत) कम हो गये हैं।
3. स्कूलों और शिक्षकों की बदहाली की झलक छात्रों की दर्ज संख्या में दिखनी ही थी। मध्यप्रदेश में 2010-11 में जहाँ 133.66 लाख छात्र थे, आज घटकर मात्र 79.39 लाख रह गये हैं -- यानी दस साल में करीब 54.27 लाख (40.61 प्रतिशत) छात्र कम हो गये हैं।
4. छात्र संख्या में गिरावट का असर छात्रवृत्ति पर भी पड़ना ही था। सरकार दस साल पहले 82 लाख स्कूली छात्रों को छात्रवृत्ति देती थी, अब ये भी घटकर 58 लाख रह गई है। इस प्रकार, 24 लाख (29.27 प्रतिशत) स्कूली बच्चे छात्रवृत्ति के दायरे से बाहर ढकेल दिए गए हैं।
एक रिपोर्ट बताती है कि धीरे-धीरे मध्यप्रदेश के 90 प्रतिशत सरकारी स्कूल बंद करने और महज 12000 स्कूलों से काम चलाने की योजना बना ली गई है। इन स्कूलों को निजी स्कूलों की तरह विकसित किया जाएगा। इसका सीधा अर्थ है, संपूर्ण स्कूली शिक्षा का पूरा-पूरा निजीकरण।
कुछ लोगों को यह रिपोर्ट अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकती है। लेकिन फिर लोकसभा में दी गई उस जानकारी पर नजर डालें, जिसके अनुसार 2014 के बाद पूरे देश में 89,441 स्कूल बंद हुए हैं और इनमें से 60 प्रतिशत मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में बंद हुए हैं, जिनके कारण पिछले चार सालों में ही 2021-24 के बीच पहली कक्षा से आठवीं कक्षा के बीच पढ़ने वाले 2 करोड़ से अधिक बच्चों को सरकारी स्कूल से बाहर होना पड़ा है। इसलिए इस रिपोर्ट को सही माना जाना चाहिए कि मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार अपनी केंद्र सरकार की नीतियों को पूरी ईमानदारी से आगे बढ़ाने में लगी हुई है।
मध्यप्रदेश की जनसंख्या बढ़ रही है, लेकिन स्कूलों में छात्रों और शिक्षकों की संख्या घट रही है। तो छात्र जा कहां रहे है? छात्र जा रहे हैं गांव-गांव में कुकुरमुत्तों की तरह खुलने वाले निजी स्कूलों में, और इनमें से अधिकांश स्कूल और वहां पढ़ाने वाले शिक्षक संघी गिरोह से ताल्लुक रखते हैं। इन स्कूलों में नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा के नाम पर सरकारी पाठ्यक्रम से दीगर ऐसी किताबें पढ़ाई जा रही हैं, जो अवैज्ञानिक और हिंदुत्ववादी दृष्टिकोण से लबरेज हैं, जिसमें मिथकों और पौराणिक कहानियों को इतिहास बनाकर पेश किया जा रहा है, जो बच्चों के मन में सांप्रदायिक नफरत पैदा करती है और कुल मिलाकर, संघी गिरोह के एजेंडे को पूरा करती हैं।
लेकिन क्या मध्य प्रदेश के सभी 54 लाख छात्रों ने निजी स्कूलों में दाखिला लिया है? इस समय ऐसा कोई सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जो यह बता सके कि निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या कितनी है? प्रदेश में सरकारी स्कूलों की औसत दाखिला क्षमता 96 छात्र प्रति स्कूल हैं। यदि इसे ही पैमाना माना जाएं, तो प्रदेश के 25000 निजी स्कूलों की अधिकतम दाखिला क्षमता 24.2 लाख ही होती है। इसका अर्थ है कि सरकारी स्कूलों से बाहर होने वाले आधे से बहुत-कम छात्रों को ही निजी स्कूलों में प्रवेश का मौका मिला है और निश्चित ही ये समाज के विशिष्ट तबकों से जुड़े होंगे। स्थाई रूप से शिक्षा क्षेत्र से बाहर होने वाले बच्चों में लगभग सभी दलित, आदिवासी और सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के बच्चे ही शामिल हैं और हमारे समाज की पितृसत्तात्मक संरचना को देखते हुए यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि स्कूली शिक्षा क्षेत्र से बाहर होने वालों में भी अधिकांश बच्चियां ही होंगी। कुछ आंकड़े इस अनुमान की पुष्टि भी करते हैं।
मध्यप्रदेश सरकार के आंकड़ों के अनुसार ही, वर्ष 2010-11 में 11.07 लाख बच्चियों ने स्कूलों में दाखिला लिया था, लेकिन 2021-22 तक इनमें से सिर्फ 3.4 लाख बच्चियां ही 12वीं कक्षा तक पहुंच पाई। इसका मतलब है कि 68.21 प्रतिशत बच्चियों के हाथ से 12वीं कक्षा में पहुंचने से पहले ही पुस्तकें छीन ली गईं।
बच्चियों के बारे में मध्यप्रदेश में भाजपा राज की एक और योजना की हकीकत के बारे में जान लें, और वह योजना है लाड़ली लक्ष्मी योजना, जिसे तब के स्वनामधन्य मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुरू किया था। यह योजना लिंगानुपात सुधारने और बच्चियों को स्कूलों में दाखिला कराकर उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित करने के लिए बनाई गई थी। योजना यह है कि किसी बच्ची के जन्म लेने के साथ ही उसके खाते में 1.43 लाख रुपए डाल दिए जाए, जिससे उसे 6वीं से 2000 रुपए, 9वीं से 4000 रुपए, 11वीं में 6000 रुपए और कॉलेज पहुंचने पर 25,000 रुपये की छात्रवृत्ति दी जा सके। 2007 में यह योजना शुरू हुई थी और पहले वर्ष 40,854 बच्चियों का पंजीयन हुआ था। इनमें से केवल 1477 बच्चियां ही कॉलेज पहुंच पाई हैं, जो कुल बच्चियों का सिर्फ 3.61 प्रतिशत ही है। मनुवादी सरकार को स्कूलों से बाहर होने वाली इन बच्चियों के भविष्य की भी चिंता नहीं है। मध्यप्रदेश में दलित और आदिवासी समुदाय से जुड़ी 60 प्रतिशत बच्चियों छात्रवृत्ति न मिलने और जाति प्रमाण पत्र न बनने के कारण स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर हो जाती है। अब मोहन यादव सरकार को यह भी नहीं मालूम होगा कि शिवराज जमाने में बनी यह योजना जिंदा है या मृत? भाजपा राज में 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के नारे की यही हकीकत है। यही है मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति का भाजपा शासित राज्यों में व्यावहारिक अमल।
मोदी सरकार जिस नई शिक्षा नीति को संस्कार और भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने की पुड़िया में पेश कर रही है, उसका असली मकसद यही है : सरकारी स्कूलों को बदहाल बनाओ और आरएसएस के एजेंडे से संचालित निजी स्कूलों को बढ़ावा दो। मध्य प्रदेश इस नीति के असरदार क्रियान्वयन की प्रयोगशाला है। स्कूली बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का संविधान का निर्देश उठाकर घूरे पर फेंक दिया गया है। मनुवादी ताकतें जानती हैं कि जनता के बहुमत को अशिक्षित रखकर ही वे अपने को सुरक्षित रख सकती हैं।
छानबीन करेंगे, तो कमोबेश ऐसी ही स्थिति छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान सहित सभी भाजपा शासित राज्यों की होगी। जनता को अशिक्षित और जाहिल करने वाली इसी नीति को गैर-भाजपा शासित राज्यों में लागू करने के लिए मोदी सरकार दबाव डाल रही है। यह सुकून की बात है कि केरल, जहां लगभग सौ प्रतिशत साक्षरता है, की वामपंथी सरकार ने इस शिक्षा नीति को ठुकराने की घोषणा की है। दक्षिण के सभी गैर-भाजपा शासित राज्यों ने भी केरल के रास्ते पर चलने का ऐलान किया है।
यही हालत उच्च शिक्षा की है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक टास्क फोर्स की रिपोर्ट है कि वर्ष 2022 में लगभग 13000 छात्रों ने आत्महत्या की थी। इस टास्क फोर्स की अंतरिम रिपोर्ट ने पिछले एक दशक में शिक्षा क्षेत्र में किए गए कथित क्रांतिकारी सुधार के मोदी सरकार के दावों की पोल खोलकर रख दी है। नई शिक्षा नीति के नाम पर जो कदम मोदी सरकार ने लागू किए हैं, वे विशुद्ध रूप से शिक्षा को बाजार का माल बनाने और सरकार की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए उसका निजीकरण करने से ही प्रेरित हैं। वास्तविकता तो यह है कि सरकार की पूरी शिक्षा नीति अवैज्ञानिक है और यह स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा दोनों को बर्बाद कर रही है। एक ओर, शिक्षा महंगी होती जा रही है और दूसरी ओर, विभिन्न बहानों की आड़ में छात्रों को समय पर उनकी छात्रवृत्ति के भुगतान से इनकार किया जा रहा है। यह वित्तीय तनाव छात्र झेल नहीं पाते और आत्महत्या के लिए प्रवृत्त होते हैं।
वास्तव में जनता की ज़हालत और अशिक्षा ही भाजपा की सबसे बड़ी पूंजी है, जिसे नई शिक्षा नीति के माध्यम से वह मजबूत करने की कोशिश कर रही है। मनु की वर्ण व्यवस्था इसी जहालत और अशिक्षा के आधार पर समाज की रचना करना चाहती है, जिसे हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के निर्माण के नाम पर भाजपा की सरकारें आगे बढ़ा रही हैं। फिर विकास के नाम पर शिक्षा का बजट, छात्र कल्याण की योजनाएं आदि-इत्यादि की घोषणा करने का दिखावा भी अप्रासंगिक होकर रह जाता है। रूस में मजदूर-किसान राज के संस्थापक लेनिन का कहना था कि जनता बारूद होती है और शिक्षा चिंगारी। इसलिए विस्फोट से बचने के लिए जरूरी है कि जनता (बारूद) और शिक्षा (चिंगारी) को मिलने ही मत दो। किसी भी तानाशाह-फासीवादी और सांप्रदायिक-कॉरपोरेट परस्त सरकार की यही कोशिश होती है।
(लेखक मप्र एसएफआई के पूर्व अध्यक्ष और अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)