खबरदार, राम कहा जो कुत्ते को!
(व्यंग्य आलेख : संजय पराते)
संघी गिरोह और उनकी अगुआई करने वाले मोहन भागवत-नरेंद्र मोदी-अमित शाह का सहारा मंदिर ही है। राम मंदिर आंदोलन भले ही लाल कृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री न बना पाया हो, लेकिन नरेंद्र मोदी इसी आंदोलन के सहारे राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरे और प्रधानमंत्री बने। मोहन भागवत भी आज सत्ता की वह मलाई चाट रहे हैं, जिसकी कल्पना उनके पूर्वजों ने नहीं की थी। अमित शाह के हौसले भी बुलंद है कि एक तड़ीपार उस हैसियत में पहुंच गया है, जहां वह जब चाहे, जिसको चाहे, ठिकाने लगा सकता है।
जब मंदिर में इतनी ताकत आ जाएं कि रोजी-रोटी के मुद्दे गौण हो जाएं, तो भला राजनीति में कौन इस मुद्दे को छोड़ देगा? फिर मंदिर मुद्दे का तो संघ-भाजपा ने पेटेंट करा लिया है, फिर भला और किसमें हिम्मत है इस मुद्दे को उठाकर जुर्माना भरने की? कांग्रेस कोशिश करती रहती है कि नेहरू की धर्मनिरपेक्षता से थोड़ा अलग राह चले-दिखे, संघ-भाजपा से वह ज्यादा धार्मिक दिखें, सत्ता में आने पर संघी गिरोह के बने-बनाए रोडमैप पर चलने की भी कोशिश करती है, लेकिन फिर धड़ाम से गिर पड़ती है। छत्तीसगढ़ में हमने यही देखा। सलाहकारों की सलाह थी कि भाजपा से निपटने भाजपा से ज्यादा 'राम राम' किया जाए, अडानी को हसदेव में बुलाकर चरण पखारे जाएं और भाजपा को बता दिया जाए कि तेरे से बड़े कॉरपोरेट परस्त हम। सरकार ने सलाहकारों की बात मानी, लेकिन जनता ने तो सरकार को ही ठुकरा दिया और भाजपा को फिर से बुला लिया, कहा : ऐसे में फिर भाजपा ही क्या बुरी है?
तो मंदिर मुद्दा संघ-भाजपा की जान है। छत्तीसगढ़ में उसे अभी एक शेरू से दुश्मनी हो गई है। एक कुत्ते में शेर की कल्पना की जा सकती है, उसे शेरू कहकर बुलाया जा सकता और हमारे राष्ट्रीय पशु के स्वाभिमान को कोई चोट नहीं पहुंचती। उसे रामू भी कह सकते हैं, जो हमारे घरों में काम करने वाले दलितों का नाम हो सकता है और इससे उनके भी स्वाभिमान को कोई चोट पहुंचने का सवाल ही नहीं है, क्योंकि वर्ण व्यवस्था में कोई दलित अपने स्वाभिमान का दावा भी कैसे कर सकता है? लेकिन किसी कुत्ते के लिए राम नाम का विकल्प भी नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इससे किसी हिंदू को पहुंचे या न पहुंचे, संघी गिरोह की आस्था को ठेस जरूर पहुंचती है। खबरदार, अपने कुत्ते का नाम राम रखा तो! संघी लठैत तुम्हारा रामनाम करने के लिए तैयार है। जब तक राम इस देश के राष्ट्रीय भगवान नहीं बन जाते, तब तक आस्था के इस खेल को तो खेलना ही पड़ेगा। इसके बाद भी, जो बचा-खुचा है, उसे रामदेव, आसाराम और राम रहीम आदि-इत्यादि तो मिलकर खेल ही रहे हैं और हिंदुत्व की बुनियाद मजबूत कर रहे हैं। कोई व्यभिचार के आरोप में जेल में बंद है, तो कोई भ्रष्टाचार के आरोप में अदालत की फटकार खा रहा है। लेकिन किसी के राम नाम से बेचारे संघियों का स्वाभिमान आहत नहीं होता, क्योंकि हमाम में सब नंगे हैं।
हमारी मान्यता है कि कण-कण में भगवान है, तो निश्चय ही कुत्ते में भी राम का वास है ही। हमारे धार्मिक ग्रंथों में कुत्ते को भैरव देव का वाहन माना गया है। स्वयं भैरव देव को शिव भगवान का पांचवां अवतार माना जाता है। भगवान शिव और राम एक-दूसरे के आराध्य थे और मिथकों के अनुसार, लंका युद्ध से पहले, राम ने शिव का आशीर्वाद पाने के लिए रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी। हनुमान को भी भगवान शिव का अवतार माना जाता है, जो छाया की तरह राम के सेवक बनकर रहे। तो शिव के अवतार भैरव का वाहन कुत्ता निकृष्ट या कमतर कैसे हो सकता है, जिसे लेकर छत्तीसगढ़ में संघी गिरोह हल्ला मचा रहा है?
वैसे इस देश में कमीने-कुत्तों की कोई कमी नहीं है। देश में कोई मंदिर नहीं बचेगा, तो वह 'कुत्ता मंदिर' (Dog Temple)भी बनवा लेगा। वैसे पहले से ही कर्नाटक में 'नाई देवस्थान' नामक एक प्रसिद्ध मंदिर है, जो असल में एक कुत्ते का मंदिर है। योगी के उत्तरप्रदेश में बुलंदशहर के पास सिकंदराबाद में साधु लटूरिया बाबा के कुत्ते का मंदिर है। यहां बाबा तो ताकते रह गए, लेकिन मंदिर बन गया है उसके कुत्ते का। यहां होली और दिवाली में मेला लगता है और कुत्ते के सहारे लटूरिया बाबाजी भी जिंदा है। कुत्ता न रहता, तो फिर बाबा को ही कौन पूछता? यह कुत्ता मंदिर उतना ही पुराना है, जितना कि आरएसएस, जो इस समय अपनी सौवीं जयंती मना रहा है। झांसी में 'कुतिया माता' का मंदिर है। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के खपरी गाँव में 'कुकुरदेव' मंदिर है, जिसका निर्माण फणी नागवंशी शासकों ने करवाया था। ये सब वो इतिहास है, जिसके खिलाफ संघी गिरोह युद्ध छेड़े हुए हैं। अब इस कुकुरदेव मंदिर के लिए नाग शासकों के वंशजों को राष्ट्रद्रोही ठहराया जा सकता है। उनका दोष इतना ही नहीं है कि उनके पूर्वजों ने कुकुर मंदिर बनवाया, उन्होंने इसमें देवत्व की भी प्रतिष्ठा कर दी है। जो कुकुरदेव पर आस्था नहीं रखते, अब वे बतंगड़ खड़ा करेंगे कि राम बड़ा या कुकुरदेव? दरअसल, हुआं-हुआं चिल्लाने वाले हिंदुत्व गिरोह को हमारे धर्मग्रंथों में उल्लेखित कुत्तों-कुतियों की महिमा और उन्हें देवता मानकर पूजे जाने वाले मंदिरों के यश का भी कोई ज्ञान नहीं है, उन्हें सिर्फ राम के नाम पर उन्माद फैलाना और आतंकी धौंस जमाना आता है और यह गुंडई-नंगई-कुत्ताई भाजपा सरकार के पूरे संरक्षण में चल रही है।
अब गुजरात में चुनाव आने वाले हैं, तो सोमनाथ मंदिर का अभियान शुरू हो गया। हमारे देश में हजारों पुराने मंदिर हैं, जो अपने स्वाभिमान की पुनर्बहाली के लिए संघ-भाजपा की राह ताक रहे हैं। हर रोज गली-कूचों में जमीन पर अवैध कब्जा करके और उसे हड़पने के लिए कहीं राम के नाम पर, तो कहीं शिव के नाम पर, कही अलाने भगवान के नाम पर, तो कहीं फलाने भगवान के नाम पर मंदिर निर्माण अभियान चल रहा है। संघ-भाजपा के लिए यही राष्ट्र निर्माण अभियान है। जितने ज्यादा अवैध मंदिर बनेंगे, उतना ही ज्यादा हमारे देश का सांस्कृतिक गौरव उत्थान होगा।
2047 के विकसित भारत की ओर हमारे कदम इसी तरह बढ़ेंगे। हम अपने वेदों से खोज-खोज कर गोबर से, आलू से सोना बनाने की विधियां निकालेंगे और अमेरिका टैरिफ बढ़ा-बढ़ाकर इसे लूटने की योजना बनाएगा। अभी तो हम गोबर से सोना बनाने के काम में लगे हैं, तो अमेरिका का यह हाल है। कहीं हमें गोबर से हीरा बनाने की विधि हाथ में लग जाएं, तो ट्रंप साहब आज ही मोदीजी को हटाकर यहां स्वयं विराजमान हो जाएं! यही सोच-सोचकर हम कांप रहे हैं, अपने हाथ रोके हुए हैं। न सोना बना रहे हैं, न हीरा, बस भविष्य के लिए गोबर का ढेर लगाए जा रहे हैं। अपनी संप्रभुता की रक्षा भी कर रहे हैं और ट्रंप को ललकार भी रहे हैं कि अब लगाओ, कितना टैरिफ लगाते हो हमारे गोबर के ढेर पर। जबलपुर में तो इस सरकार ने साढ़े तीन करोड़ रुपयों पर ही गोबर लीप दिया है और लिपाई करने वालों के घर सोने से भर गए हैं। इस गोबर की सुगंध से ट्रंप का सिर भन्नाया हुआ है। उनके पूरे कस-बल, वेनेजुएला में आजमाए उनके विनाशक हथियार ढीले पड़े हुए हैं। ट्रंप अब राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने की सोच रहे हैं, मोदीजी को फोन-पर-फोन करके दनादन माफी मांग रहे है। आधुनिक युग में इसे विदेश नीति और प्रतिरक्षा क्षेत्र में गोबर के महत्वपूर्ण योगदान के रूप में छात्रों को पढ़ाया जा सकता है।
तो बात मंदिर की चल रही है। राम मंदिर अभियान तो 35 सालों तक चला है। इतिहास की पुस्तकें उठाकर देख लीजिए, मुस्लिमों ने अतीत में हमारे मंदिर तो लूट लिए, इन मंदिरों पर अपनी मस्जिदें भी खड़ी कर लीं, लेकिन यह सब अतीत का हिस्सा है। मंदिरों को लूटा जा रहा था, और हमारे धर्म रक्षक ब्राह्मण पंडे जनता को लूट रहे थे, उन्हें मंदिरों अपने को बचाने की फुर्सत कहां थी? कुछ फुर्सत मिली भी, तो बौद्धों को कुचलने में लगा दी थी। लेकिन यह अतीत की बात है। आधुनिक इतिहास में अब संघ-भाजपा के इतने लंबे समय तक चले मंदिर निर्माण के राजनीतिक अभियान को पढ़ाया जाएगा, जो पूरे विश्व का अनूठा अभियान है। इस अभियान की विशेषता है कि यह शुरू तो होता है, लेकिन कहीं जाकर खत्म नहीं होता। इस अभियान के सहारे कहीं भी, कभी भी सांस्कृतिक आत्मसम्मान जगाया जा सकता है। सोते हुए हिंदुओं को जगाया जा सकता है और जागृत हिंदुओं को सुलाया जा सकता है। जो सोना न चाहे, उन्हें दफनाने का इंतजाम भी किया जा सकता हैं। इस सम्मान के लिए आधे-अधूरे बने राम मंदिर का मोदी जी उद्घाटन भी कर सकते हैं और एक साल बाद उस पर चढ़कर घंटा भी बजा सकते हैं। मोदीजी मंदिर पर चढ़कर घंटा बजा रहे हैं और नीचे जनता मंदिर-विरोधी विपक्ष की घंटियां बजा रही है। आह, क्या अदभुत नजारा है! राजनीति में ऐसा नजारा भारत के सिवा और कहीं देखने को मिलेगा? यह भारत की धर्म-प्राण जनता का सर्वोत्कृष्ट है, जो मोदीजी के बिना संभव नहीं था। प्राइम मिनिस्टर इन डबल वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी भी यह नहीं कर पाए और सत्ता के शिखर पर पहुंचने में नाकामयाब हो गए।
तो मित्रों, मंदिर-मंदिर का खेल फुल स्पीड में चालू है। इसमें कुत्तों ने भी एंट्री ले ली है। अब खबरदार, जो कुत्ते का नाम राम रखा तो!
(व्यंग्य-लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)