केजरीवाल पर अदालत का फैसला : संकेत, सन्देश और सियासत
केजरीवाल संबंधी निर्णय ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अदालत के फैसले के संकेत, संदेश और सियासी असर पर

केजरीवाल संबंधी निर्णय : संकेत,सन्देश और सियासत
न्यूज हैंड /तनवीर जाफरी
Arvind Kejriwal से जुड़े हालिया निर्णय ने देश की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। अदालत के फैसले के बाद सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। यह मामला सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी समीकरणों और राजनीतिक संदेशों से भी जुड़ गया है।
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने पिछले दिनों विवादित दिल्ली आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने सीबीआई द्वारा अदालत में पेश किये गये सबूतों को कमजोर और अपर्याप्त बताया और कहा कि आरोपियों की कोई आपराधिक साजिश या इरादा साबित नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि केवल दावे पर्याप्त नहीं होते बल्कि ठोस सबूत होने भी ज़रूरी हैं। अदालत ने कहा कि चार्जशीट में खामियां हैं और कोई साक्ष्य भी नहीं मिला। इस अदालती फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज़ हो गयी है। गौरतलब है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने नवंबर 2021 में नई आबकारी नीति लागू की थी। इस नीति का उद्देश्य शराब की बिक्री का निजीकरण कर ग्राहक सुविधा बढ़ाना और शराब की कालाबाजारी रोकना बताया गया था। परन्तु जुलाई 2022 में मुख्य सचिव की रिपोर्ट में प्रक्रियागत खामियां , मनमाने फैसले और 500 करोड़ से अधिक का नुकसान बताते हुए दिल्ली के तत्कालीन एल जी, वी के सक्सेना ने सीबीआई जांच की सिफ़ारिश की।
उस समय केंद्र सरकार की अधीनस्थ संस्थाओं सीबीआई और ईडी द्वारा यह आरोप लगाया गया कि दिल्ली सरकार के तत्कालीन आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया द्वारा इस नयी आबकारी नीति को निजी शराब कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए तैयार किया गया था। जिसमें 100 करोड़ के कैशबैक आम आदमी पार्टी के कई नेताओं को मिले। तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को इस पूरे मामले का मुख्य साजिशकर्ता बताया गया। इसके बाद जुलाई 2022 में एलजी की सिफ़ारिश से ही अगस्त में सीबीआई व ईडी द्वारा केस रजिस्टर्ड किया गया तथा सितंबर में नयी आबकारी नीति रद्द कर दी गयी । इसी के बाद फऱवरी 2023 में मनीष सिसोदिया को और मार्च 2024 में केजरीवाल को गिरफ़्तार कर लिया गया। अब जहाँ संबंधित अदालत द्वारा केजरीवाल व सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया गया हैं वहीं ख़बर यह भी है कि निचली अदालत के इस फ़ैसले को चुनौती देने हेतु सी बी आई संभवत: हाई कोर्ट का रुख़ कर सकती है।
बहरहाल इस अदालती फ़ैसले के बाद विपक्ष एक बार फिर केंद्र सरकार पर हमलावर है। क्योंकि मोदी सरकार के दौरान ही अरविंद केजरीवाल के अलावा और भी कई विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं पर ईडी, सीबीआई जैसी एजेंसियों ने कार्रवाई करने की कोशिश की। इनमें गिरफ़्तारियां भी हुईं, परन्तु अधिकांश मामलों में या तो ज़मानत मिली या मामले डिस्चार्ज हुये या फिर उन्हें अदालत से राहत मिली। उदाहरण स्वरूप झारखंड के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हेमंत सोरेन को 2024 में ईडी द्वारा लैंड स्कैम और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों में गिरफ़्तार किया गया। उन्हें सीएम पद से इस्तीफ़ा देकर जेल जाना पड़ा। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में ईडी की कार्यवाही पर स्टे लगा दिया और वे रिहा होने के बाद पुन: मुख्यमंत्री बने। इसी तरह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के विरुद्ध ईडी ने रूष्ठ्र स्कैम में हाईकोर्ट ने जांच की मंजूरी तो दे दी परन्तु लोकायुक्त ने उन्हें क्लीन चिट दे दी। यूँ ही कभी केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को ईडी द्वारा ?466 करोड़ का स्नश्वरू्र नोटिस जारी किया गया व कई कारण बताओ नोटिस जारी किये गये। परन्तु अभी तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हो सकी। इसी तरह तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव,डी शिवकुमार,पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी जैसे और भी कई नेताओं से ई डी व सी बी आई पूछताछ कर चुकी है।
पिछले दिनों हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को भी पंचकूला के एजेएल जमीन आवंटन मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा हुड्डा के खिलाफ आरोप तय किए जाने के आदेश को रद्द कर दिया है और उन्हें "क्लीन चिट" दे दी। इसके आधार पर आरोप तय करने के सीबीआई कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया गया। परन्तु केंद्र सरकार के अधीनस्थ कार्यरत ईडी, सी बी आई या आयकर जैसे विभाग विपक्षी नेताओं पर कोई न कोई आरोप मढ़कर उन्हें न केवल परेशानियों में डाल देते हैं बल्कि इस तरह के आरोपों से उनके राजनीतिक चरित्र को भी दाग़दार बनाने की पूरी कोशिश करते हैं। और सही मायने में जो वास्तव में भ्रष्ट होते हैं वे तो आनन फानन में दल बदल कर भजपाई वाशिंग मशीन से गुजरकर चरित्रवान होने का प्रमाण पत्र हासिल कर लेते हैं। और भय वश उपजी इस प्रीत के बदले में उन्हें कहीं मुख्यमंत्री तो कहीं उपमुख्यमंत्री,मंत्री,सांसद या अन्य उच्च पदों पर सुशोभित कर दिया जाता है। आंकड़े यूँ ही नहीं बताते कि ईडी ने 2014 से लेकर अब तक करीब 121 प्रमुख नेताओं पर मामले रजिस्टर्ड किये इन में 95त्न विपक्षी नेता थे। और 2015 से 2025 तक ईडी द्वारा दर्ज 193 मामलों में केवल 2 ही दोष सिद्धियां हुईं। शेष अधिकांश मामलों में या तो अदालत ने आरोपियों को राहत दी या फिर सबूतों के अभाव में मामले कमजोर पड़ गये।
जहाँ तक केजरीवाल संबंधी अदालती निर्णय के बाद उपजी सियासत का सवाल है तो जहां अदालती फैसला आते ही विपक्ष एकजुट होकर केजरीवाल के साथ खड़ा नजर आ रहा था वहीं केजरीवाल का बिलख बिलख कर रोते हुए मीडिया के सामने पेश होकर अपनी बेगुनाही का सबूत देना चाह रहे थे। और हद तो तब हो गयी जबकि उसी दिन बुलाई गयी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे उन्हें जेल भेजने वाली भाजपा से भी ज्यादा कांग्रेस पर ही निशाना साधते नजऱ आये। सत्ता से सवाल पूछने के बजाय वे यह कहते सुनाई दिये कि "केजरीवाल जेल गया, क्या रॉबर्ट वाड्रा जेल गए? संजय सिंह जेल गए, क्या राहुल गांधी जेल गए? मनीष सिसोदिया जेल गए, क्या सोनिया गांधी जी जेल गईं? कांग्रेस किस मुंह से बात करती है, शर्म नहीं आती?" ज़ाहिर है यह केजरीवाल की राजनीतिक बयानबाज़ी का ही एक हिस्सा था जिससे विपक्षी एकता कमजोर हुई। क्योंकि अब कांग्रेस भी पूछ रही है कि 30 से अधिक मामलों से जूझने वाले राहुल की आँखों में कभी आंसू नहीं आये तो केवल एक मामले का सामना करने में केजरीवाल का इसतरह मीडिया के सामने रोने का क्या अर्थ है? केजरीवाल के कांग्रेस विरोधी बयान को राजनीतिक विश्लेषक पंजाब, उत्तराखंड, गोवा व गुजरात में होने वाले आगामी चुनावों से जोड़कर भी देख रहे हैं। और इसे आप व भाजपा की कांग्रेस विरोधी संयुक्त रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं। यही वजह है कि केजरीवाल संबंधी अदालती निर्णय के संकेत इसके सन्देश और इसके पीछे की सियासत आदि सभी पहलुओं को बहुत बारीकी से समझने की ज़रूरत है।
(आईडब्ल्युएनए)
