भारत की रीढ़ की हड्डी गुम

राजनीतिक व्यंग्य-समागम
. रीढ़ की हड्डी : विष्णु नागर
जिसकी देखो, उसकी आजकल रीढ़ की हड्डी गुम है। मुख्यमंत्रियों की गुम है, मंत्रियों की गुम है। अफसरों की गुम है, जजों की गुम है, संपादकों और एंकरों की गुम है। पुलिस, सीबीआई, ईडी के प्रमुखों की गुम है। और तो और, प्रधानमंत्री की गुम है। उनकी जुबान जहां खुलनी चाहिए, वहां बंद है और जहां बंद रहनी चाहिए, वहां खुली रहती है। उनके अपने ही निवास में सुनते हैं कि बहुत बड़ा खेला हो गया है, मगर उनकी और उनके गोदी मीडिया की जुबान बंद है। सब तरफ खुसफुसाहट है, मगर किसी के गले में आवाज़ नहीं। न कहीं खंडन है, न मंडन, क्योंकि रीढ़ की हड्डी गुम है। देश के गुंडों के आगे गुम है, विदेशों के गुंडों के सामने गुम है। अडानी के आगे गुम है, अंबानी के आगे गुम है। बताया था एक बार प्रधानमंत्री ने कि उनकी छाती छप्पन इंची है, मगर जब रीढ़ की हड्डी गुम है, तो छाती कितनी भी इंची हो, न होने जैसी है। गली-गली में धर्म के नाम पर गुंडे नंगा नाच, नाच रहे हैं, मगर उनके आगे बड़े-बड़े सत्ताधारियों की फूंक निकली हुई है। वे जिस राह चलते की चाहें तो गर्दन पकड़ लें, मरोड़ दें, उसे घुसपैठिया बता दें या गाय का मांस खाने वाला या धर्म परिवर्तन करवाने वाला बता दें, चलेगी उनकी ही, पीड़ित की नहीं, क्योंकि उनके आगे बड़ों-बड़ों की रीढ़ की हड्डी गुम है।
रीढ़ की हड्डी गुम है, मगर किसी को इसकी चिंता नहीं है।जिनकी गुम है, वे खुश हैं कि गुम है। उन पर तन कर सीधे खड़े होने की जिम्मेदारी नहीं है। किसी ने आज तक इसकी एफआईआर तक दर्ज करवाना जरूरी नहीं समझा है, क्योंकि गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने के लिए भी रीढ़ की हड्डी चाहिए! यह अपनी तरह का विचित्र और विकट संकट है और इतना बड़ा संकट है कि दस में से नौ खाते-पीते लोग इससे पीड़ित हैं। पीड़ित हैं और सुखी हैं।
इस माहौल में एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी ने मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के सामने अपनी रीढ़ की हड्डी दिखा दी। मंत्री ने अपशब्द बोला, तो उस पत्रकार ने कहा कि आप अपना शब्द चयन ठीक कीजिए। बात करने की तमीज मत भूलिए। आजकल गली-मोहल्ले के छोकरों से इस हिम्मत से बात करने का कोई खतरा नहीं उठाता, क्योंकि क्या पता वह बजरंगी हो, किसी हिंदू सेना का सेनापति हो, जबकि इस पत्रकार ने एक वरिष्ठ मंत्री को उसके अपने शहर में तमीज का पाठ पढ़ा दिया! सब चकित रह गए कि यह क्या हो गया! कैसे एक गोदी मीडिया के पत्रकार की रीढ़ की हड्डी बची हुई है! बचा कैसे ली इसने? भोपाल से दिल्ली तक चिंता की लहर दौड़ गई है! आजकल तो बड़े से बड़े अंग्रेजी के तीस मार खां पत्रकारों की हालत टाइट है। दो शब्द बोलने या लिखने से पहले पांच मिनट तक सोचते हैं। फिर आगे बढ़ते हैं या पीछे हटते हैं। आगे बढ़कर पीछे हटते हैं!
प्रणव रॉय के जमाने का एनडीटीवी होता, तो बात और थी। माना जा सकता था कि यह पत्रकार अपनी नहीं, उनकी बची-खुची, क्षत-विक्षत रीढ़ की हड्डी के दम पर बोल रहा है, मगर अब तो यह समाचार चैनल मोदी जी के भ्रातासम गौतम अडानी का है। फिर भी उसके एक कर्मचारी की रीढ़ की हड्डी बच गई, यह प्रधानमंत्री तथा अडानी के लिए यानी देश के लिए चिंता की बात है! देश को असली 'खतरा' चीन या पाकिस्तान से नहीं, रीढ़ की हड्डी वाले चंद इधर -उधर बचे भारतीयों से है!
जिसने भी वह वीडियो देखा, वह ढूंढ रहा है कि क्या उसकी अपनी रीढ़ की हड्डी अभी भी बची हुई है? कुछ ने पाया कि बची हुई है, इसलिए खुश हैं, तो कुछ हैरान और परेशान हैं कि पता नहीं कब यह कौन-से संकट का कारण बन जाए! वे अपनी इस दुश्मन हड्डी से डरे हुए हैं।
(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के उपाध्यक्ष है।)
