अमरिकी सेनाओं द्वारा वेनेजुएला पर हमला

3 जनवरी 2026 की सुबह इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। वाशिंगटन से आई एक घोषणा ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को झकझोर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बताया कि अमेरिकी सेनाओं ने व्यापक सैन्य कार्रवाई में वेनेजुएला(Military action in Venezuela) के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में ले लिया है। और उन्हें न्यूयॉर्क ले जाया जा रहा है जहाँ नार्को-टेररिज्म के आरोपों पर ट्रायल होगा। ट्रम्प ने साथ ही यह स्पष्ट किया कि वेनेजुएला का शासन और संक्रमण प्रक्रिया अब अमेरिका के “नियंत्रण” में होगी। यह कदम मात्र सैन्य हस्तक्षेप नहीं, बल्कि ऐसा भू-राजनीतिक विस्फोट है जो तेल कीमतों को हिला सकता है और वैश्विक संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करेगा। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देश में अमेरिकी प्रभाव की यह सीधी स्थापना रूस, चीन और ईरान के लिए खुला संकेत है। यह संकट केवल ऊर्जा बाजारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव को भी चुनौती देगा, जहाँ पेट्रो डॉलर की शक्ति और ब्रिक्स की आकांक्षाएँ आमने-सामने खड़ी हैं।



वेनेजुएला का संकट अचानक नहीं, बल्कि वर्षों की विफल नीतियों का परिणाम है। इसकी नींव ह्यूगो शावेज के दौर में पड़ी, जब तेल आधारित समाजवादी मॉडल को समृद्धि का आधार बनाया गया। समय के साथ भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और आर्थिक कुप्रबंधन ने इस व्यवस्था को खोखला कर दिया। 2014 में वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट ने संकट को उजागर किया और देश अति मुद्रास्फीति, खाद्य कमी व स्वास्थ्य आपदा में डूब गया। परिणामस्वरूप लाखों नागरिकों को पलायन करना पड़ा। सत्ता बचाने के लिए निकोलस मादुरो ने रूस, चीन और क्यूबा का सहारा लिया तथा अमेरिकी प्रतिबंधों को चुनौती दी। इसके जवाब में ट्रम्प प्रशासन ने दबाव बढ़ाया। सितंबर 2025 से कैरेबियन क्षेत्र में तस्करी से जुड़े जहाजों पर हमलों ने तनाव तेज कर दिया। अंततः डेल्टा फोर्स और सीआईए के संयुक्त अभियान में मादुरो गिरफ्तार हुए। ट्रम्प ने इसे “नार्को-आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई” बताते हुए वेनेजुएला को “सुरक्षित संक्रमण” तक ले जाने की बात कही। लेकिन आलोचकों के अनुसार वास्तविक लक्ष्य विशाल तेल भंडारों पर नियंत्रण है, जो लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभुत्व की वापसी और क्षेत्रीय अस्थिरता का संकेत देता है।






इस संकट का सबसे तात्कालिक प्रभाव वैश्विक तेल बाजार पर पड़ा है। वेनेजुएला फिलहाल वैश्विक आपूर्ति का लगभग एक प्रतिशत, यानी करीब दस लाख बैरल प्रतिदिन तेल उत्पादन करता है, लेकिन उसके भंडार दुनिया में सबसे बड़े हैं। हमले के बाद ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें साठ से इकसठ डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहीं, पर भू-राजनीतिक जोखिम के कारण पाँच से दस डॉलर की बढ़ोतरी की आशंका है। यदि उत्पादन या निर्यात बाधित हुआ—जैसे बंदरगाहों की नाकेबंदी या बीमा अड़चनें—तो भारी कच्चे तेल की कमी से डीजल और परिष्कृत ईंधन महंगे हो सकते हैं। अभी बाजार में आपूर्ति की अधिकता है; अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार लगभग अड़तीस लाख बैरल प्रतिदिन का सरप्लस मौजूद है, इसलिए तत्काल असर सीमित रहा। लेकिन संघर्ष लंबा चला तो तेल अस्सी से सौ डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति तेज होगी। विशेषज्ञ इसे अल्पकालिक झटका और दीर्घकालीन संतुलन परिवर्तन मानते हैं।





दीर्घकाल में यह संकट तेल कीमतों पर दबाव भी बना सकता है। यदि अमेरिकी प्रतिबंध हटते हैं और शेवरॉन जैसी कंपनियां निवेश करती हैं, तो वेनेजुएला का उत्पादन दो से तीन मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुँच सकता है। इससे भारी कच्चे तेल की अधिकता होगी और कीमतें पचास से साठ डॉलर के दायरे में सिमट सकती हैं। ट्रम्प का कहना है कि अमेरिकी कंपनियां वेनेजुएला के तेल उद्योग को अत्यधिक लाभकारी बनाएंगी, जिससे पेट्रोडॉलर की पकड़ मजबूत होगी। लेकिन यदि गुरिल्ला प्रतिरोध, आंतरिक विद्रोह या रूस-चीन का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप हुआ, तो उत्पादन में दस लाख बैरल की गिरावट कीमतों को तीस से चालीस डॉलर तक उछाल सकती है। इससे रूस और ईरान जैसी तेल-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को गहरा झटका लगेगा। साथ ही यह ब्रिक्स की डी-डॉलराइजेशन रणनीति को कमजोर कर सकता है, जबकि क्षेत्रीय अस्थिरता शिपिंग लागत बढ़ाकर नई चुनौतियां खड़ी करेगी।

वेनेजुएला संकट ने वैश्विक कूटनीति में तनाव की नई सीमाएँ खींच दी हैं। रूस और चीन इसे प्रत्यक्ष अमेरिकी हस्तक्षेप मानते हैं। रूस पहले ही सैन्य सहायता दे चुका है, जबकि चीन वेनेजुएला के लगभग अस्सी प्रतिशत तेल निर्यात का आयात करता है। यदि अमेरिका पूर्ण नियंत्रण स्थापित करता है, तो रूस की यूक्रेन युद्ध फंडिंग पर सीधा प्रभाव पड़ेगा, वहीं ईरान को भी भारी कच्चे तेल के बाजार में नुकसान झेलना पड़ेगा। कुछ विश्लेषक इसे “रिवर्स क्यूबन मिसाइल क्राइसिस” बता रहे हैं, जहाँ रूस या चीन लैटिन अमेरिका में सैन्य ठिकाने बनाने का प्रयास कर सकते हैं। क्षेत्रीय स्तर पर कोलंबिया, ब्राजील और निकारागुआ जैसे देशों में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। यह कदम संयुक्त राष्ट्र चार्टर की भावना के विरुद्ध माना जा रहा है, जिससे वैश्विक कूटनीति कमजोर हो सकती है। इसके बावजूद ट्रम्प प्रशासन इसे “नार्को-टेररिज्म विरोधी कार्रवाई” बताकर वैध ठहराने का प्रयास कर रहा है।


वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव गहरा और बहुपक्षीय होगा। तेल कीमतों में उछाल से मुद्रास्फीति बढ़ेगी, जिसका सीधा असर भारत और चीन जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ेगा। भारी कच्चे तेल के बड़े आयातक भारत को विशेष लागत दबाव झेलना पड़ सकता है। इसके विपरीत, कीमतों में गिरावट अमेरिकी उपभोक्ताओं को राहत दे सकती है और शेयर बाजारों में जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ा सकती है। सुरक्षा दृष्टि से अमेरिका पश्चिमी गोलार्ध में अपनी पकड़ मजबूत करेगा, लेकिन लैटिन अमेरिका में विरोध और असंतोष भी तेज होगा। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे पेट्रो डॉलर को अस्थायी संबल मिलेगा, जबकि ब्रिक्स देश वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की ओर और तेजी से बढ़ेंगे। यदि संघर्ष पनामा नहर तक पहुँचा, तो वैश्विक व्यापार को गहरा झटका लगेगा।


आगे यह संकट कई राहें अपना सकता है। यदि अमेरिका संक्रमण प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से संभाल लेता है, तो तेल उत्पादन बढ़ेगा, कीमतें संतुलित रहेंगी और रूस-चीन की रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ेगी। किंतु यदि व्यापक प्रतिरोध उभरा, तो यह इराक या अफगानिस्तान जैसा लंबा और महंगा फंदा बन सकता है। गुरिल्ला संघर्ष, आंतरिक विरोध और अंतरराष्ट्रीय दबाव अमेरिकी संसाधनों पर भारी बोझ डालेंगे। कम संभावना लेकिन उच्च प्रभाव वाले परिदृश्य—जैसे लैटिन अमेरिका में रूसी सैन्य अड्डा—दुनिया को नए शीत युद्ध के द्वार पर ला सकते हैं। ऐसे में भारत जैसे देशों को सतर्क नीति अपनानी होगी, क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती बनने जा रही है।

वेनेजुएला का संकट किसी एक राष्ट्र की कहानी नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को झकझोरने वाला तूफान है। तेल बाजारों में यह अस्थिरता के साथ दीर्घकालिक पुनर्संरचना लाएगा, जबकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका, रूस और चीन के बीच टकराव और तीखा होगा। यह संकट पेट्रो डॉलर को बल दे सकता है, पर डी-डॉलराइजेशन की प्रक्रिया को भी तेज करेगा। इतिहास संभवतः इसे “ट्रम्प कोरोलरी” के रूप में याद रखे—अमेरिकी प्रभुत्व की निर्णायक वापसी। प्रश्न यही है कि क्या यह स्थिरता लाएगा या नए वैश्विक संघर्ष की नींव रखेगा। उत्तर भविष्य में छिपा है, लेकिन दुनिया को इसके लिए तैयार रहना होगा।

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