भारतीय पुलिस अपनी मर्यादा न लांघे, पत्रकार सम्मान सर्वोपरि

दिल्ली पुलिस द्वारा समाचार एजेंसी ‘यूएनआई’ के कार्यालय को उच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला देते हुए शुक्रवार को सील कर दिया गया, जिसे समाचार एजेंसी ने ‘प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला’ बताया. एजेंसी ने पुलिस पर कर्मचारियों के साथ मारपीट और बदसलूकी का भी आरोप लगाया है.
लेखक-सौरभवाष्र्णेय
भारतीयपुलिस जिसे संविधान प्रदत्त एक ऐसी अनुशासिक प्रक्रिया है जो देश की जन सुरक्षा प्रहरीकहलाती है। वह आज अपनी मर्यादा लांघती नजर आ रही है। यानी पुलिस शब्दका पूरा रूप केवल कानून प्रवर्तन के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द नहीं है, बल्कि यह एक संक्षिप्त रूप है जो सार्वजनिकव्यवस्था के रक्षकों के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को विशिष्ट अर्थ प्रदान करता है। पुलिसऑफिसर ऑफ लीगल इंवेस्टीगेशन क्रिमिनल इमरजेंसीज संक्षिप्त रूप से इसे ऐसे भी समझ सकतेहैं कि पुलिस का पूरा नाम कानूनी जांच और आपराधिक आपात स्थितियों के लिए लोक अधिकारीहै। यह एक कानून प्रवर्तन एजेंसी है जो सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने, अपराधों की रोकथाम और जांच करने तथा समुदायकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार है। पुलिस अधिकारी कानून का पालन कराने, आपात स्थितियों में प्रतिक्रिया देने, जांच करने और समाज में सुरक्षा की भावनाको बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज भारतीय पुलिस अपनी मर्यादा नलांघे क्यों लिख रहा हूं तो इसका सीधा साधा अर्थ है कि वर्तमान में कई घटनाएं घटरही हैं जिन्हें पुलिस चाहे तो चंद मिनट में समाप्त कर सकती है। लेकिन पुलिस अपना बलभूल चुकी है। त्रेतायुग में श्री जावमंत जी ने हनुमान जी को उनका बल याद दिलाया थाआज कलयुग में पुलिस को उनका बल याद दिला रहा हूं।
माना जाता है कि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और इसका मान सम्मान के पूरीजिम्मेदारी -दायित्व पुलिस पर है क्योंकि जिन नेताओंकी चापलूसी या कुछ चंद पैसों के लिए अपनी वर्दी यानी बल को भूल चुके हैं उसे फिर सेजागृत करे। जिस कार्य के लिए आपको जिम्मेदारी दी है उसे पूर्ण करें। अगर आप नेताओंके कहने पर अपना बल भूल जाओगे तो अधिक से अधिक क्या होगा स्थानांतरण या लाइन हाजिर।इससे भी अधिक क्या होगा? या चंद पैसे जो कि नकलीखुशी दे सकते हैं। या कुछ और....आजएक समाचार एजेंसी पर या अन्य जगह सरकार की बात जो कि असंवैधानिक है क्यों मानते हो? एक दिन पूर्व की घटना है कि दिल्ली पुलिसएक प्रसिद्ध समाचार एजेंसी के कार्यालय पर जाकर अदालती का फरमान दिखाते हुए सारी मार्यादायेंलांघ दीं। क्या तनिक सोचा कि हम किस पर हमला कर रहें है । हम पत्रकार नारद मुनि कीमानद संतान हैं जो कि इस कलयुग में आज हम निशुल्क रूप से अपनी सेवा दे रहे हैं। जिसमेहनताना की आप सोच रहे हैं जो पत्रकारों को मिलता हैवह एक साधारण कर्मचारी को भी मिल जाता है। ऐसे में यह न्यायोचित नहीं है। कि हम पत्रकारोंका असम्मान करें। उन्हें जा चाहे वहां परेशान करें। आज तक जो पत्रकार अपनी ईमानदारीसे कार्य रहा है उसे आज तक सांच को आंच नहीं है वाली बात है। पुलिस अपना मानवता धर्मनिभाये। पत्रकार कोई क्रिमिनल नहीं है, हत्यारा नहीं है, चोर नहीं है, आत्मसम्मान का भूखा है। स्वयं भूखा रहकरजनता के हितों की बात करता है। जनता तक पहुंचाने में अपनी जान की बली दे देता है। जिसकेसाक्षात परिणाम हम सबके सामने हैं। पत्रकार की जिंदगी ऐसी जिदंगी है वह इस कलयुग कालमें कई जिंदगियां जीता है जिसे कोई नहीं समझ सकता । एक पत्रकार जब असमय मर जाता हैतो उसके परिवार पर क्या बीतती है वो परिवार ही जाने। मैं यही कहूंगा कि पुलिस के बड़ेअधिकारी जब आईपीएस इंडियन पुलिस सेवा चुनते हैं और देहरादून जाकर प्रशिक्षण कर आतेहैं वहीं उन्हें मीडिया के समक्ष कैसा व्यवहार करना है बताया जाता है।
ऐसेमें जब यह पुलिस अधिकारी समाज में अपनी सेवा देता है तब वह अपने अधिनस्थों को भी प्रशिक्षणदेकर एक पत्रकार का सम्मान कर सकता है। पुलिस को भी जब जब जरूरत पड़ी है तब तब एक पत्रकारने ही उसका न्याय जनता के सामने दिखाया है। वहींअन्य प्रदेशों की पुलिस भी एक जैसी बात देखने को मिलती है। उत्तर प्रदेश को ले लो जहांकोई मुख्यमंत्री या अन्य वीवीआईपी आता है तो विपक्षी नेताओं को उनके घर में नजरबंदकर दिया जाता है। कोईगैस की समस्याओं को कवरेज करना जाता है तो उसे शांति भंगकी धाराओं में बंद कर दिया जाता है। जिसको कुछ करना होता है वह बेचारी इस पुलिस कोआगे कर देती है जैसे भीष्म पितामह के सामने कर दिया गया। यह क्या है । पुलिस जैसी व्यवस्था को संविधान ने बड़े मुख्य रूप से उल्लेखित किया गया है। लेकिनहम पुलिस वाले दबाव में सब कुछ भूले जा रहे हैं। यह देश कहां जा रहा है। जहां पत्रकारको एक निमित्त मानकर पुलिस जब चाहे तब असम्मान कर देती है। अगरहम पुलिस के कार्यों पर ध्यान दें तो मुख्यतः निम्नलिखित कार्य हैं,पहला अपराध निरोध एवं अपराधों का विवेचन।दूसरा यातायात नियंत्रण तीसरा स्थानीय नागरिकों, समितियों, संगठनों और निरिक्षण क्षेत्र में परिवारोंके बारे में ज्ञात रखना और उनसे सौहार्दपूर्ण संबंध रखना तथा असामजिक व्यक्तियों औरघटनाओं से संबंधित जानकारियों को ध्यान में रखना तथा अन्य में राजनीतिक सूचनाओं काएकत्रीकरण तथा राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण व्यक्तियों की सुरक्षा सहित समाज मेंसुरक्षा दृष्टि गोचर भी है। पुलिस के अन्य रूप भी है जो कि गोपनीय रूप से कार्य करतेहैं।
पत्रकारोंके साथ पुलिस का व्यवहार लोकतंत्र की कसौटी खरा उतरना चाहिए। लोकतंत्र का चौथा स्तंभमाने जाने वाले पत्रकार समाज की आंख और कान होते हैं। वे न केवल घटनाओं को जनता तकपहुंचाते हैं, बल्कि सत्ता और व्यवस्था की जवाबदेही भीसुनिश्चित करते हैं। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि पुलिस—जो कानून और व्यवस्था की रक्षक है—पत्रकारों के साथ संवेदनशील, सहयोगपूर्ण और सम्मानजनक व्यवहार करे।हालके वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां पत्रकारों के साथ पुलिस का व्यवहार सवालों के घेरे में रहा है। कहीं रिपोर्टिंगके दौरान उन्हें रोका गया, तो कहीं अनावश्यक दबावया अभद्रता का सामना करना पड़ा। यह स्थिति न केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावितकरती है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी चोट पहुंचातीहै।पुलिसऔर पत्रकार दोनों का उद्देश्य समाज में शांति, पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित करना है।पुलिस जहां कानून का पालन करवाती है, वहीं पत्रकार सच्चाईको सामने लाते हैं। ऐसे में दोनों के बीच टकराव नहीं, बल्कि समन्वय होना चाहिए। यदि पुलिस पत्रकारोंके प्रति सहयोगी रवैया अपनाती है, तो इससे न केवल सूचनाओंका प्रवाह सुचारू होता है, बल्कि आम जनता का विश्वासभी मजबूत होता है।यहभी समझना जरूरी है कि पत्रकारों को अपने दायित्वों का निर्वहन करते समय सुरक्षा औरस्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। पुलिस का दायित्व है कि वह उन्हें सुरक्षित वातावरणप्रदान करे, न कि उनके कार्य में बाधा उत्पन्न करे।वहीं पत्रकारों को भी चाहिए कि वे संवेदनशील मामलों में संयम और जिम्मेदारी का परिचयदें।समयकी मांग है कि पुलिस और मीडिया के बीच बेहतर तालमेल स्थापित किया जाए। इसके लिए प्रशिक्षण, संवाद और स्पष्ट दिशानिर्देशों की आवश्यकताहै। यदि दोनों संस्थाएं एक-दूसरे की भूमिका औरमहत्व को समझें, तो समाज को इसका सीधा लाभ मिलेगा।
अगरहम इतिहास पर जाते है तो विकिपीडिया भी बताता है कि हिंदू काल में इतिहास में दंडधारीशब्द का उल्लेख आता है। भारतवर्ष में पुलिस शासन के विकास क्रम में उस काल के दंडधारीको वर्तमान काल के पुलिस जन के समकक्ष माना जा सकता है। प्राचीन भारत का स्थानीय शासनमुख्यतः ग्रामीण पंचायतों पर आधारित था। गाँव के न्याय एवं शासन संबंधी कार्य ग्रामिकनामी एक अधिकारी द्वारा संचालित किए जाते थ। इसकी सहायता और निर्देशन ग्राम के वयोवृद्धकरते थे। यह ग्रामिक राज्य के वेतनभोगी अधिकारी नहीं होते थे वरन् इन्हें ग्राम केव्यक्ति अपने में से चुन लेते थे। ग्रामीणों के ऊपर 5-10 गाँवों की व्यवस्था के लिए गोप एवं लगभगएक चौथाई जनपद की व्यवस्था करने के लिए स्थानिक नामक अधिकारी होते थे। प्राचीन यूनानीइतिहास वेत्ताओं ने लिखा है कि इन निर्वाचित ग्रामीण अधिकारियों द्वारा अपराधों की रोकथामका कार्य सुचारू रूप से होता था और उनके संरक्षण में जनता अपने व्यापार उद्योग-निर्भय होकर करती थी।मुगलों के पतन केउपरांत भी ग्रामीण शासन की परंपरा चलती रही। यह अवश्य हुआ कि शासन की ओर से नियुक्तअधिकारियों की शक्ति क्रमश: लुप्तप्राय होती गई।सन् 1765 में जब अंग्रेजों ने बंगाल की दीवानी हथियाली तब जनता का दायित्व उन पर आया। वारेन हेस्टिंग्ज़ ने सन् 1781 तक फौजदारों और ग्रामीण पुलिस की सहायतासे पुलिस शासन की रूपरेखा बनाने के प्रयोग किए और अंत में उन्हें सफल पाया। लार्ड कार्नवालिसका यह विश्वास था कि अपराधियों की रोकथाम के निमित्त एक वेतन भोगी एवं स्थाई पुलिसदल की स्थापना आवश्यक है। इसके निमित्त जनपदीय मजिस्ट्रेटों को आदेश दिया गया कि प्रत्येकजनपद को अनेक पुलिस क्षेत्रों में विभक्त किया जाए और प्रत्येक पुलिस क्षेत्र दारोगानामक अधिकारी के निरीक्षण में सौंपा जाय। इस प्रकार दारोगा का उद्भव हुआ। बाद में ग्रामीणचौकीदारों को भी दरोगा के अधिकार में दे दिया गया।
इसप्रकार मूलत वर्तमान पुलिस शासन की रूपरेखा का जन्मदाता लार्ड कार्नवालिस था। वर्तमानकाल में हमारे देश में अपराधनिरोध संबंधी कार्य की इकाई, जिसका दायित्व पुलिस पर है, थाना अथवा पुलिस स्टेशन है। थाने में नियुक्तअधिकारी एवं कर्मचारियों द्वारा इन दायित्वों का पालन होता है। सन् 1861 के पुलिस ऐक्ट के आधार पर पुलिस शासन प्रत्येकप्रदेश में स्थापित है। इसके अंतर्गत प्रदेश में महानिरीक्षक की अध्यक्षता में और उपमहानिरीक्षकोंके निरीक्षण में जनपदीय पुलिस शासन स्थापित है। प्रत्येक जनपद में सुपरिटेंडेंट पुलिसके संचालन में पुलिस कार्य करती है। सन् 1861 के ऐक्ट के अनुसार जिलाधीश को जनपद के अपराध संबंधी शासन का प्रमुख और उस रूप मेंजनपदीय पुलिस के कार्यों का निर्देशक माना गया है। पत्रकारों के साथ अच्छा व्यवहार केवल एक नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मजबूती की अनिवार्यशर्त है। पुलिस का संवेदनशील और सम्मानजनक रवैया ही इस दिशा में सकारात्मक बदलाव लासकता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है, समाचार पत्र व पत्रिकाओं मेंसमसमायिक विषयों पर चिंतक, राजनीतिक विचारक
