भारतीय न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोप और मामले लगातार सुर्खियों में

Corruption impact on judiciary credibility




न्यूज हैंड/डॉ. प्रियंका सौरभ

न्यायपालिका भारत के लोकतंत्र का संरक्षक स्तंभ है, जो संविधान की रक्षा करता है और नागरिकों को न्याय का आश्वासन देता है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं की सोशल साइंस किताब पर सख्त रुख अपनाते हुए छपाई, वितरण और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। किताब के 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' अध्याय में 'न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार', लंबित मामलों की भारी संख्या, जजों की कमी और पूर्व सीजेआई बी.आर. गवई के बयानों का उल्लेख था। सीजेआई सूर्यकांत ने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की 'गहरी और सोची-समझी साजिश' करार दिया तथा शिक्षा मंत्रालय और एनसीईआरटी निदेशक को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। विवादित अध्याय के लेखकों की पहचान, उनकी योग्यता और सिलेबस फ्रेमिंग बैठकों की कार्यवाही प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है। यह घटना न केवल शिक्षा नीति पर सवाल उठाती है, बल्कि संस्थागत गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भ्रष्टाचार पर खुली चर्चा के बीच संतुलन की बहस को जन्म देती है। क्या स्कूली पाठ्यक्रम में ऐसी चर्चा गलत है? या यह समाज को सतर्क करने का माध्यम है?

भारतीय संविधान अनुच्छेद 19(एक) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन अनुच्छेद 19(दो) में उचित प्रतिबंध भी हैं, जिनमें न्यायालय की अवमानना शामिल है। सुप्रीम कोर्ट का कदम अवमानना अधिनियम 1971 के दायरे में आता है, जहां न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली सामग्री दंडनीय है। कोर्ट ने तर्क दिया कि अध्याय चुनिंदीय (सेलेक्टिव) था—न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार का उल्लेख तो प्रमुख था, लेकिन विधायिका या कार्यपालिका पर ऐसा कोई जिक्र नहीं। लंबित मामलों को 'मैसिव बैकलॉग' कहना और जजों की कमी को चुनौती के रूप में पेश करना संस्था को कमजोर दिखाता है। पूर्व सीजेआई गवई के बयान का संदर्भ बिना पूर्ण संदर्भ के लिया गया, जो भ्रामक था। कोर्ट ने इसे 'डीप-रूटेड कांस्पिरेसी' कहा, जो संकेत देता है कि यह केवल शैक्षणिक चूक नहीं, बल्कि सुनियोजित प्रयास हो सकता है। एनसीईआरटी द्वारा हाल में संशोधित पाठ्यक्रम में ऐसी सामग्री शामिल करना शिक्षा मंत्रालय की लापरवाही दर्शाता है। सिलेबस एक्सपर्ट कमिटी की बैठकों में पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठे हैं—क्या लेखक राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित थे? कोर्ट ने गहन जांच का भरोसा दिलाया है, जो स्वागतयोग्य है।





भ्रष्टाचार पर चर्चा लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार, भारत का करप्शन परसेप्शन इंडेक्स 2025 में 40/100 रहा, जो न्यायपालिका सहित संस्थाओं की चुनौतियों को रेखांकित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं ब्रह्मावर्त हॉस्टल मामले या मेडिकल एडमिशन घोटालों में भ्रष्टाचार पर तीखी टिप्पणियां की हैं। जस्टिस जे.एस. वर्मा ने कहा था कि 'ज्यूडिशियरी में भ्रष्टाचार का एक मामला भी पूरी संस्था को दागदार बनाता है।' लेकिन स्कूली किताब में इसे सामान्यीकृत कर पेश करना उचित नहीं। बच्चे 13-14 वर्ष के होते हैं—उन्हें तथ्यपरक ज्ञान दें, न कि पूर्वाग्रहपूर्ण दृष्टिकोण। अध्याय जवाबदेही, शक्तियों के पृथक्करण और सुधारों (जैसे फास्ट-ट्रैक कोर्ट, जजों की भर्ती) पर केंद्रित होता तो उपयोगी होता। वर्तमान रूप में यह नकारात्मकता बोता है, जो युवा पीढ़ी में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा कर सकता है। हरियाणा जैसे राज्यों में, जहां पंचायती राज मजबूत है, स्थानीय न्याय व्यवस्था पहले से जूझ रही है—ऐसी सामग्री से ग्रामीण बच्चे हतोत्साहित होंगे।

एनसीईआरटी की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। नई शिक्षा नीति 2020 के तहत पाठ्यक्रम सरलीकृत और भारतीयता-केंद्रित बनाने का लक्ष्य था, लेकिन यह विवाद उलटा असर डाल रहा है। मंत्रालय को सिलेबस फ्रेमिंग में बहुपक्षीय परामर्श अनिवार्य करना चाहिए—शिक्षाविद्, न्यायिक विशेषज्ञ, अभिभावक संगठन शामिल हों। लेखकों की योग्यता जांचे—क्या वे राजनीति विज्ञान के विशेषज्ञ हैं या सामान्य शिक्षक? कोर्ट ने डिजिटल कॉपियां भी जब्त करने को कहा, जो साइबर युग में चुनौतीपूर्ण है। लेकिन यह कदम आवश्यक था, क्योंकि गलत सूचना वायरल हो सकती थी। वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वरिष्ठों ने कोर्ट में इसे चुनिंदीय बताया, जो बहस को मजबूत करता है। अब जांच से यदि साजिश सिद्ध हुई, तो जिम्मेदारों पर अवमानना का मुकदमा चलेगा।





यह मामला व्यापक सुधारों की मांग करता है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार रोकने हेतु राष्ट्रीय न्यायिक आयोग (एनजेएसी) को मजबूत बनाएं, जो जजों की नियुक्ति पारदर्शी करे। ई-कोर्ट प्रोजेक्ट को तेज करें, ताकि लंबित मामले घटें—वर्तमान 5 करोड़ से अधिक हैं। जजों की संख्या बढ़ाने हेतु विधायी सहमति लें। शिक्षा में भ्रष्टाचार को नैतिकता के अध्याय में शामिल करें, न कि संस्था-विशेष पर प्रहार के रूप में। अभिव्यक्ति स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन संस्था की गरिमा सर्वोपरि। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप सही दिशा में है—यह चेतावनी है कि शिक्षा भ्रष्टाचार नहीं बोएगी।

एनसीईआरटी को पाठ्यक्रम पुनरीक्षण कर तथ्यपरक, संतुलित सामग्री सुनिश्चित करनी चाहिए। सरकारें पारदर्शिता बढ़ाएं—आरटीआई से सिलेबस प्रक्रिया खुली हो। जनता जागरूक बने, क्योंकि मजबूत न्यायपालिका ही मजबूत भारत है। यदि भ्रष्टाचार पर चर्चा सुधार लाए, तो स्वागतयोग्य; अन्यथा यह साजिश मात्र। सुप्रीम कोर्ट की जांच से सत्य सामने आएगा, और शिक्षा प्रणाली मजबूत बनेगी। लोकतंत्र में संतुलन ही सफलता की कुंजी है।



(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

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