नरेन्द्र मोदी जी अपने दोस्तों से भारत की बेइज़्ज़ती क्यों करा रहे हैं?

Update: 2026-03-16 01:21 GMT

नरेन्द्र मोदी जी ने भारत की बेइज्जती करा दी। ? :

भारत लंबे समय से अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और वैश्विक सम्मान के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री Narendra Modi की कूटनीति और विदेशी नेताओं से उनकी नजदीकियों को लेकर देश के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं।कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि अब केवल एक मजबूत लोकतंत्र की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रिश्तों के आधार पर चलने वाली विदेश नीति की तरह दिखने लगी है।



लेखक/न्यूज हैंड /राजेंद्र शर्मा

एक बात हमारी समझ में तो नहीं आती। जब से ट्रंप साहब दोबारा अमेरिका की गद्दी पर आए हैं, तब से न जाने क्यों मोदी जी के विरोधियों ने एक नया राग ही छेड़ दिया है– राग बेइज़्ज़ती।

परदेस के मामले में नरेन्द्र मोदी जी कुछ भी करें, बल्कि नहीं भी करें, पर भाई लोग उसमें भारत की बेइज़्ज़ती ढूंढ निकालते हैं और फिर इसका शोर मचाने लगते हैं कि देश की बेइज़्ज़ती करा दी। बेचारे मोदी भक्तों ने तो इसी कांय-कांय के डर से दुनिया में मोदी जी के भारत का डंका बजवाने की चर्चा ही करनी बंद कर दी है। न डंका बजने का जिक्र निकलेगा और न बेइज़्ज़ती के डंकों के ताने सुनने पड़ेंगे। फिर भी विरोधी हैं कि मानते ही नहीं हैं।

अब बताइए, ईरान पर अमेरिका और इस्राइल ने हमला किया, पर मोदी जी ने कुछ कहा? हमले के ठीक पहले दौड़े-दौड़े इस्राइल तक गए, नेतन्याहू को गले भी लगाया, इस्राइलियों का हमेशा साथ देने का भरोसा भी दिलाया। होलोकॉस्ट म्युजियम में जाकर इमोशनल होकर भी दिखाया। पर क्या सिर पर मंडराते युद्ध के संबंध में एक शब्द तक कहा?



एक शब्द तक इस्राइल में नहीं कहा तो नहीं कहा, देश में लौट आने के बाद भी नहीं कहा। ईरान पर हमला हो जाने के बाद भी नहीं कहा। न पक्ष में, न विपक्ष में, एक शब्द तक नहीं कहा। किसलिए? इन्हीं विरोधियों के मुंह बंद रखने के लिए। मगर इनकी जुबान तो मोदी जी के एक शब्द तक न कहने के बावजूद चल ही रही है। उल्टे अब तो मोदी जी को कुछ नहीं कहने के लिए ही ताने दिए जा रहे हैं।

एक विदेशी अखबार ने लिख दिया कि -- 'नरेंद्र मोदी ईरान के खिलाफ युद्ध के मामले में चुप क्यों हैं। डोनाल्ड ट्रंप के डर से!’ बस भाई लोग डोनाल्ड ट्रंप के डर की बात ले उड़े और लगे शोर मचाने कि ट्रंप के डर से भारत की बेइज़्ज़ती करा दी! बेचारे मोदी जी ने मुंह तक नहीं खोला और भारत की बेइज़्ज़ती भी हो गयी?





और जब अपने देश वाले ही विदेशी जुबान के और विदेश के अखबारों की बातों में आएंगे और गुलामी के अवशेषों से नरेन्द्र मोदी जी की लड़ाई को कमजोर करने लग जाएंगे, तो बाहर वालों से तो मोदी जी उम्मीद ही क्या कर सकते हैं? बताइए, ईरान वाले भी तानाकशी पर उतर आए। अमेरिका-इजराइल के हवाई हमलों ने अधमरा कर रखा है। सुप्रीम लीडर समेत, बीसियों बड़े नेता पहले ही झटके में दूसरी दुनिया में पहुंचाए जा चुके हैं। फिर भी अगले मोदी जी को ताना मारने से बाज नहीं आये। बारहवें दिन मोदी जी ने ईरान के राष्ट्रपति को खुद फोन किया, ये बताने के लिए कि भारत बुद्ध का देश है, इसलिए युद्ध नहीं चाहता है, तो विश्व गुरु से शांति की सीख लेना तो दूर रहा, अगले से इतना भी नहीं हुआ कि अपने हाथों से बंद की हुई हार्मुज की खाड़ी से भारत के तेल-गैस टैंकरों को निकलवा देता। उल्टे अपने विदेश मंत्री से जयशंकर को इसकी याद दिलवा दी कि ईरान पर हमले की भारत ने निंदा तक नहीं की। विश्व गुरु छोड़िए, इस साल ब्रिक्स का अध्यक्ष होकर भी, उसने निंदा तक नहीं की। यानी बुद्ध के देश से सौदेबाजी -- हमले की निंदा करो, तेल लो! और विदेशी अखबार सुर्खियां लगा रहे हैं कि मोदी जी ट्रंप के डर से चुप हैं! और अपने वाले तो जैसे ट्रंप का नाम आने का इंतजार ही करते रहते हैं। उधर अखबार में छपा और इधर शोर मच गया -- मोदी जी ने भारत की बेइज्जती करा दी।





अब नरेन्द्र मोदी जी भारत की बेइज्जती के शोर के डर से, ट्रंप और नेतन्याहू जैसे डियर फ्रेंडों की कारगुजारियों की निंदा तो नहीं ही कर देंगे। दोस्ती में, नो सॉरी, नो निंदा!

पर बात-बात में भारत की बेइज्जती खोजने वाले, नरेन्द्र मोदी जी की चुप्पी पर ही कहां रुकने वाले थे। इसी लड़ाई में ईरान ने दुनिया का तेल और गैस का बहाव रोक कर, तेल के दाम को मिसाइल बनाकर अमेरिका पर ही दाग दिया। ट्रंप को डियर फ्रैंड मोदी की याद आ गयी। बोले जा फ्रैंड, ले ले रूस से तेल, महीने भर तक। जा, तुझे इजाजत दी! मैंने ही रोका था, अब मैं ही इजाजत दे रहा हूं, जा ले ले रूसी तेल। पर जब तक राष्ट्र भक्त रूस से सस्ता तेल भरवाने के लिए अपने पीपे, ड्रम वगैरह निकालते, तब तक विरोधियों ने ‘‘इजाज़त’’ पर ही हंगामा खड़ा कर दिया। कहने लगे कि ट्रंप होता कौन है, हमें इजाजत देने वाला कि हम किस से तेल लें और किस ने नहीं लें। यह तो भारत की बेइज्जती है। नरेन्द्र मोदी जी अपने दोस्तों से भारत की बेइज़्ज़ती क्यों करा रहे हैं?

और हद्द तो तब हो गयी जब इसके चार दिन बाद ही ट्रंप ने सारी दुनिया को खुली छूट दे दी -- जाओ ले लो, रूसी तेल, जब तक मैं रुकने को न कहूं! अब विरोधियों को इसमें भी भारत की बेइज्जती दिखाई दे रही है। कह रहे हैं कि अब तो फ्रैंडशिप का धोखे का पर्दा भी हट गया। काहे का फ्रैंड और काहे की फ्रेंडशिप और काहे की इजाज़त!




सच पूछिए तो, ट्रंप-मोदी की दोस्ती के दुश्मनों ने, मोदी जी के इस दोस्ती के चक्कर में भारत को बेइज्जत कराने का शोर मचाना तभी से शुरू कर दिया था, जब विदेश मंत्री के कई दिन अमेरिका में जाकर धरना देने के बाद भी, मोदी जी को ट्रंप के राज्याभिषेक का न्योता नहीं मिला। न्यौता न मिलने का मामला पूरी तरह से शांत भी नहीं हुआ था, तब तक मोदी जी के ऑपरेशन सिंदूर छेड़ने के चौथे ही दिन, जब ट्रंप ने लड़ाई रुकने का ऐलान कर दिया, मोदी जी के विरोधियों ने शोर मचाना शुरू कर दिया कि ट्रंप कैसे भारत के लड़ाई रोकने का फैसला कर रहा है? फिर ट्रंप ने बार-बार यह दावा भी करना शुरू कर दिया कि भारत-पाकिस्तान की लड़ाई उसी ने रुकवायी थी, दोनों को व्यापार की गाजर और टैरिफ का डंडा दिखाकर लड़ाई रुकवायी थी और मोदी जी फ्रेंडशिप का ख्याल कर के चुप लगा गए, तभी से विपक्षी पीछे पड़ गए कि मोदी जी भारत की बेइज्जती करा रहे हैं।

फिर नरेन्द्र मोदी जी ने ट्रेड डील में ट्रंप की रूसी तेल खरीदना बंद करने की डिमांड मान ली, उसके बाद से भारत की बेइज्जती कराने का जो शोर शुरू हुआ, अब तक थमा नहीं था। अब ये ईरान के मामले में चुप रहने में भारत की बेइज्जती का शोर और।

पर नरेन्द्र मोदी जी और उनके अनुयायी सच्चे देशभक्त हैं, वे देश की इज़्ज़त को बहुत ऊंचे आसन पर रखते हैं, जहां उसे कुछ भी छू भी नहीं सकता है। इसीलिए, तो मोदी कुनबे को जगत गति नहीं व्याप्ती! वैसे भी इज्जत-बेइज्जती सब मानने की बातें हैं। बेइज़्ज़ती उसकी होती है, जो इज़्ज़त बचाने की फिक्र में रहता है। कुनबा इन चक्करों में नहीं पड़ता।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोक लहर' के संपादक हैं।)

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