भारत की राजनीति में उम्र, सत्ता और नैतिकता पर बड़ी बहस

Update: 2026-03-14 00:06 GMT

क्या राजनीति में 'रिटायरमेंट' एक अनैतिक शब्द है?

भारत में जब भी राजनीति और उम्र की बात होती है, तो एक बड़ा सवाल सामने आता है—क्या राजनीति में रिटायरमेंट होना चाहिए?

जहाँ एक तरफ सरकारी नौकरियों में 58 से 60 वर्ष की आयु के बाद रिटायरमेंट तय है, वहीं राजनीति में ऐसा कोई स्पष्ट नियम नहीं है। परिणामस्वरूप कई नेता 70, 80 और यहाँ तक कि 90 वर्ष की आयु तक सक्रिय राजनीति में बने रहते हैं।

यही कारण है कि समय-समय पर यह बहस उठती रही है कि क्या राजनीति में भी एक नैतिक रिटायरमेंट की परंपरा होनी चाहिए।



ओंकारेश्वर पांडेय -विनायक फीचर्स

बहुत साल पहले एक बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा था... लोग यह याद नहीं रखते कि आप घोड़े पर कैसे चढ़े, बल्कि यह याद रखते हैं कि आप कैसे उतरे।"*

               "सत्ता की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को यह याद रखना चाहिए कि वह वहाँ हमेशा के लिए नहीं है। यदि वह समय रहते उतरना नहीं जानता, तो इतिहास उसे धक्का देकर उतारता है।" यह शब्द किसी दार्शनिक के नहीं, बल्कि उस राजनीतिक शुचिता के हैं जो आज के दौर में 'असंभव' जान पड़ती है। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के 49 वर्षीय नेता डेविड लिटिलप्राउड ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि "मैं थक गया हूँ (I'm buggered), अब मुझमें वो ऊर्जा नहीं कि मैं नेतृत्व कर सकूं।" यह बयान महज एक इस्तीफा नहीं, बल्कि उन 'कुर्सी चिपकू' राजनेताओं के लिए करारा व्यंग्य है जो 76 की उम्र में भी '25 साल और बाकी हैं' का दंभ भरते हैं। बीते मंगलवार को ऑस्ट्रेलिया की संसद में जो हुआ, उसने राजनीति की इस क्रूर परिभाषा को पूरी तरह बदल कर रख दिया। ऑस्ट्रेलिया की नेशनल पार्टी के नेता डेविड लिटिल प्राउड ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उनके पास संख्याबल कम नहीं था। पार्टी ने उनके खिलाफ कोई साजिश नहीं रची थी। कोई स्कैंडल सामने नहीं आया था। वह सिर्फ "थक गए थे।"

वो पल जिसने सबको चुप करा दिया

        संसद में प्रश्नकाल खत्म होने के बाद डेविड लिटिल प्राउड अपनी पत्नी अमेलिया के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में आए। 49 साल के इस नेता के चेहरे पर थकावट साफ झलक रही थी। उन्होंने बोलना शुरू किया तो अंदाज़ा हो गया कि यह कोई आम राजनीतिक घोषणा नहीं है।उन्होंने कहा, "मैं एक ऐसे मोड़ पर आ गया हूं, जहां मुझे लगता है कि अब समय आ गया है।" आंखों में नमी लिए लिटिल प्राउड ने कहा, "मैं बुरी तरह थक चुका हूं। मेरा मन भर गया है। मैं नेशनल पार्टी से प्यार करता हूं, मैं इसी में पला-बढ़ा हूं, और मरते दम तक इसके हरे और सुनहरे रंगों के लिए खून बहाऊंगा। मैं इसे प्यार करता हूं, लेकिन अगर मैं कहूं कि मैं ही इसे आगे ले जाने के लिए सही व्यक्ति हूं, तो यह गलत होगा। मुझमें अब ऊर्जा नहीं है।" इस दौरान एक शब्द जो उन्होंने बार-बार दोहराया वह था "बगर्ड" यानी बुरी तरह थका हुआ। यह शब्द अब ऑस्ट्रेलिया की राजनीति में अपनी अलग जगह बना चुका है।

कौन हैं डेविड लिटिल प्राउड?

 

          डेविड लिटिल प्राउड ऑस्ट्रेलिया की नेशनल पार्टी के नेता थे। यह पार्टी ऑस्ट्रेलिया की लिबरल पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन बनाती है । हमारे यहां भाजपा और शिवसेना या जदयू और राजद के गठबंधन की तरह। 2016 में पहली बार संसद पहुंचे लिटिल प्राउड जल्दी ही पार्टी के शीर्ष नेता बन गए। वह कृषि और जल संसाधन मंत्री भी रह चुके हैं।  मई 2022 में जब उन्होंने पार्टी की कमान संभाली, तब पार्टी बुरे दौर से गुजर रही थी। उनके पूर्ववर्ती बारनेबी जॉयस का कार्यकाल विवादों से भरा रहा था। लेकिन लिटिल प्राउड के सामने चुनौतियां कम नहीं थीं। एक तरफ पॉलीन हैनसन की वन नेशन पार्टी ग्रामीण इलाकों में उनकी जड़ें काट रही थी, दूसरी तरफ उनके ही पूर्व नेता बारनेबी जॉयस ने पार्टी छोड़ दी।

भारतीय परिदृश्य में नेहरू, 1962 की हार और ऐतिहासिक आत्मचिंतन

          आमतौर पर माना जाता है कि नेहरू सत्ता के अंत तक प्रधानमंत्री बने रहे, लेकिन इतिहास के पन्ने कुछ और भी कहते हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध की हार ने नेहरू को भीतर तक तोड़ दिया था। 6 मई, 1962 को (युद्ध से पहले ही) उन्होंने कांग्रेस संसदीय दल से कहा था कि वे पद छोड़ना चाहते हैं। युद्ध के बाद,बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में जब उनसे उनकी विरासत और विफलता पर सवाल हुआ, तो नेहरू ने स्वीकार किया था कि "मैंने अपनी पूरी कोशिश की, लेकिन शायद अब समय आ गया है कि नई ऊर्जा और नए विचार देश की कमान संभालें।"नेहरू ने अपनी सेवानिवृत्ति का फैसला पार्टी पर छोड़ा था, लेकिन उनके भीतर एक लोकतांत्रिक 'गिल्ट' (पछतावा) था।

कामराज प्लान: जब सत्ता को संगठन के चरणों में डाला गया

                 भारतीय राजनीति के सबसे महान 'त्याग' का उदाहरण 1963 का 'कामराज प्लान' है। के. कामराज, जो उस समय मद्रास के मुख्यमंत्री थे, ने नेहरू को सुझाव दिया कि बड़े नेताओं को सरकारी पद छोड़कर संगठन के काम में लगना चाहिए। उस समय कामराज ने खुद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया। उनके पीछे-पीछे लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम, और मोरारजी देसाई जैसे 6 केंद्रीय मंत्रियों और 6 मुख्यमंत्रियों ने इस्तीफे सौंप दिए। नेहरू की मृत्यु के बाद कामराज के पास प्रधानमंत्री बनने का स्पष्ट अवसर था। वे 'किंगमेकर' थे। लेकिन उन्होंने प्रसिद्ध वाक्य कहा "No politics, no post" (न राजनीति, न पद)। उन्होंने शास्त्री और बाद में इंदिरा गांधी को आगे बढ़ाया, खुद कभी सत्ता की मलाई नहीं चखी।

नानाजी देशमुख और 60 साल का  'लक्ष्मण रेखा' संकल्प

       भाजपा आज जिस 'नैतिकता' और 'अंत्योदय' की बात करती है, उसके पुरोधा नानाजी देशमुख ने 1977 में जनता पार्टी की सरकार में उद्योग मंत्री बनने से इनकार कर दिया था। उन्होंने घोषणा की थी कि "70 और 80 की उम्र तक सत्ता में बने रहना युवाओं के साथ अन्याय है। मैं 60 वर्ष की आयु में सक्रिय राजनीति छोड़ रहा हूँ।नानाजी ने चित्रकूट में रचनात्मक कार्य चुना लेकिन आज की भाजपा ने नानाजी के उस 'आदर्श' को कूड़ेदान में डाल दिया है।

वैश्विक परिदृश्य मोदी, ट्रंप और नेतन्याहू पर उठते सवाल

         सत्ता का मोह केवल भारत तक सीमित नहीं है। आज पूरी दुनिया में 'Gerontocracy' (वृद्धों का शासन) पर बहस छिड़ी है।  पहले भारत की बात करें तो हमारे यहां 75 पार नेताओं की कोई कमी नहीं है। शरद पवार की उम्र 85 साल है। नीतीश कुमार  75 के हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 17 सितंबर 2025 को 75 साल पूरे किए हैं। सोनिया गांधी भी 79 साल की हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे 83 के हैं।यह वही उम्र है जिस पर भाजपा ने परंपरा के तौर पर कई वरिष्ठ नेताओं को सक्रिय राजनीति से सेवानिवृत्त कर दिया था। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, आदि कई नेताओं  को 75 साल की उम्र में पदमुक्त कर दिया गया था। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में तो पार्टी ने अपने 75 से अधिक उम्र के कई नेताओं को मंत्रिमंडल से हटाकर यह संकेत दे दिया था कि यही पार्टी की नीति है।शरद पवार  ने खुद पिछले साल सितंबर में एक इंटरव्यू में कहा था, "मैं 75 साल की उम्र में नहीं रुका, अब मैं 85 साल का हूं और अभी भी काम कर रहा हूं। इसलिए मैं नरेंद्र मोदी को 75 के बाद रुकने के लिए नहीं कह सकता। मेरा कोई नैतिक अधिकार नहीं है।नरेंद्र मोदी जब 17 सितंबर 2025 को खुद 75 के हुए, तो नियम बदल दिए गए। गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि "भाजपा के संविधान में ऐसा कोई अनिवार्य रिटायरमेंट नहीं है।" पीएम ने खुद 'परीक्षा पे चर्चा' (फरवरी 2026) में कहा कि "75 पर किसी ने फोन किया, तो मैंने कहा 25 अभी बाकी हैं।"




 


संघ प्रमुख का वक्तव्य और फिर पलटाव

       इस पूरी बहस के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का एक बयान बेहद चर्चित रहा। जुलाई 2025 में नागपुर में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था - "जब लोग आपको शॉल ओढ़ने लगें, तो समझ जाइए कि अब संन्यास लेने का समय आ गया है।" बयान उस समय आया था जब मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी दोनों  सितंबर 2025 में 75 साल पूरे करने वाले थे। भागवत 11 सितंबर को और मोदी 17 सितंबर को। मोदी ने तो भागवत के जन्मदिन पर उनकी विदाई के लिए बाकायदा लेख लिख डाला,हालांकि भागवत ने इसका प्रत्युत्तर नहीं दिया। विपक्ष ने भागवत के बयान को प्रधानमंत्री के लिए संकेत बताया। शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत ने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी ने आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और जसवंत सिंह को 75 साल में रिटायर कर दिया। अब देखते हैं कि क्या वह यह नियम खुद पर लागू करते हैं।" कांग्रेस नेता अभिषेक सिंघवी ने भी कटाक्ष किया था कि "बिना आचरण के उपदेश खतरनाक होता है। मार्गदर्शक मंडल पर जो नियम लागू हुआ, वही अगर वर्तमान नेतृत्व पर लागू नहीं होता तो यह दोहरा मापदंड है।"लेकिन फरवरी 2026 में आते-आते स्थिति साफ हो गई। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने साफ कह दिया कि वह तभी पद छोड़ेंगे जब संघ उनसे कहेगा। मुंबई में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, "मैंने 75 साल पूरे कर लिए हैं और संघ को इसकी जानकारी दे दी है, लेकिन संघ ने मुझसे काम जारी रखने को कहा है। जब भी संघ कहेगा, मैं पद छोड़ दूंगा, लेकिन काम से कभी रिटायरमेंट नहीं होगा।"

यानी वही शॉल ओढ़ने वाली बात अब पीछे रह गई।

25 अभी बाकी हैं

        फरवरी 2026 में ही 'परीक्षा पे चर्चा' कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी से जब उम्र का सवाल पूछा गया तो उन्होंने एक किस्सा सुनाया। उन्होंने कहा, "75वें जन्मदिन पर एक नेता ने मुझे फोन किया। उन्होंने कहा कि आपने 75 वर्ष पूरे कर लिए हैं, तो मैंने उनसे कहा - 25 अभी बाकी हैं।यानी साफ संकेत कि वह 2047 तक काम करना चाहते हैं, जब देश आजादी के 100 साल मनाएगा। पार्टी के नेताओं ने भी साफ कर दिया है कि मोदी 2029 का चुनाव भी लड़ेंगे।  गृह मंत्री अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि भाजपा के संविधान में 75 साल में रिटायरमेंट का कोई प्रावधान नहीं है।*राजनीति में कोई रिटायरमेंट नहीं  भारत से बाहर निकलकर देखें तो अमेरिका में भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 79 वर्ष के हैं। अमेरिका में भी यह मांग उठी कि क्या 80 की दहलीज पर खड़ा व्यक्ति दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति चलाने की मानसिक क्षमता रखता है?

बेंजामिन नेतन्याहू 76 वर्ष के हैं, इजरायल में उन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और पद छोड़ने का भारी दबाव है, लेकिन वे 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का हवाला देकर कुर्सी से चिपके हैं।

क्षमता और नैतिकता का सवाल

       आज राजनीति में सवाल केवल उम्र का नहीं है। सवाल 'कार्य-निष्पादन' (Performance) का भी है।क्या 75 साल का व्यक्ति उसी गति से काम कर सकता है जो आज की AI-driven दुनिया मांगती है? सवाल यह भी है कि क्या 'नैतिकता' केवल भाषणों के लिए है?डेविड लिटिल प्राउड और न्यूजीलैंड की जेसिंडा अर्डर्न (जिन्होंने 42 साल में इस्तीफा दिया) ने साबित किया कि पद छोड़ना कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। अर्डर्न ने कहा था कि "मेरे टैंक में अब और ईंधन नहीं बचा है।"  आदर्श स्थापित करने की जिम्मेदारी हमेशा सत्ता में बैठे लोगों की होती है। यदि आप नियम दूसरों के लिए बनाते हैं और खुद पर लागू नहीं करते, तो आप 'नेता' नहीं, केवल 'शासक' हैं। भारतीय राजनीति को आज फिर से एक 'कामराज प्लान' या 'नानाजी देशमुख संकल्प' की जरूरत है। अगर 49 साल का एक ऑस्ट्रेलियाई नेता यह कह सकता है कि "मैं थक गया हूँ," तो हमारे यहाँ 80 साल के नेताओं को यह स्वीकार करने में क्या शर्म है कि अब नई पीढ़ी को मौका मिलना चाहिए? जैसा कि मैकियावेली ने कहा था "शासक को शेर और लोमड़ी दोनों होना चाहिए," लेकिन आधुनिक संदर्भ में शासक को 'इंसान' भी होना चाहिए जिसे अपनी सीमाओं का भान हो।

दुनिया में ऐसे अनेक उदाहरण

           लिटिल प्राउड अकेले नहीं हैं जिन्होंने सत्ता से ऊपर उठकर सोचा। न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने 2023 में ठीक ऐसे ही इस्तीफा दिया था। उन्होंने कहा था, "मेरे पास टंकी में पर्याप्त ईंधन नहीं बचा है।" वह भी 40 की उम्र में ही पीछे हट गईं। भूटान के राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने लोकतंत्र की नींव मजबूत करने के लिए खुद सिंहासन त्याग दिया। उरुग्वे के राष्ट्रपति होसे मुहिका ने राष्ट्रपति भवन छोड़कर अपने खेत में रहना चुना और अपना ज्यादातर वेतन दान कर दिया।

       लिटिल प्राउड का इस्तीफा हम भारतीयों के लिए कई सवाल खड़े करता है। हमारे यहां नेता बनने की होड़ है, लेकिन राजनीति छोड़ने की कला खत्म होती जा रही है। हमारे यहां 60 साल के नेता खुद को 'युवा' कहलवाते हैं और 75 साल के नेता अगले 25 साल का कार्यक्रम बना रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी जब 2014 में सत्ता में आए थे, तब उन्होंने 75 से अधिक उम्र के नेताओं को मंत्रिमंडल से हटाकर एक नई परंपरा शुरू की थी। लेकिन अब जब वह खुद 75 के हो गए हैं, तो वही परंपरा खत्म हो गई। संघ प्रमुख ने भी शॉल वाली बात कही, लेकिन फिर पलट गए।सवाल यह है कि क्या सत्ता इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके लिए हम अपने ही बनाए नियमों को भूल जाएं? क्या 49 साल में "मैं थक गया हूं" कहने वाला ऑस्ट्रेलियाई नेता ज्यादा सक्षम है, या 75 साल में "25 साल और बाकी हैं" कहने वाले भारतीय नेता?

       डेविड लिटिलप्राउड का इस्तीफा हमें एक जरूरी सबक सिखाता है। राजनीति में सबसे बड़ी ताकत सत्ता नहीं, बल्कि यह जानना है कि सत्ता छोड़ने का समय कब आ गया है। 49 साल के इस ऑस्ट्रेलियाई नेता ने वह कर दिखाया जो 85 साल के शरद पवार , 75 साल के नीतीश कुमार,83 साल के मल्लिकार्जुन खड़गे,79 साल की सोनिया गांधी या फिर खुद 75 साल के प्रधानमंत्री मोदी नहीं कर पाए।डेविड ने जो किया वह कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। यह ईमानदारी है। यह वही ईमानदारी है जो राजनीति में दिन-ब-दिन दुर्लभ होती जा रही है। जैसा कि लिटिल प्राउड के सहयोगी एंगस टेलर ने कहा, "बहुत साल पहले एक बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा था... लोग यह याद नहीं रखते कि आप घोड़े पर कैसे चढ़े, बल्कि यह याद रखते हैं कि आप कैसे उतरे।"  एक ऐसी दुनिया में जहां नेता अक्सर खुद को भगवान समझने लगते हैं और 75 साल में भी "25 अभी बाकी हैं" कहकर राजनीति में बने रहते हैं, वहां 49 साल में यह स्वीकारोक्ति कि "मैं थक गया हूं" शायद सबसे बड़ी मानवीय और राजनीतिक ईमानदारी है। *(विनायक फीचर्स)* 

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