भारत में बच्चों के लापता होने की समस्या धीरे-धीरे एक गंभीर राष्ट्रीय संकट का रूप लेती जा रही है। यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक असमानता और प्रशासनिक क्षमता की भी परीक्षा बन चुका है। हाल के वर्षों में अलग-अलग राज्यों से सामने आए मामलों ने यह संकेत दिया है कि बच्चों का गायब होना अब छिटपुट घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई बार संगठित नेटवर्क, मानव तस्करी गिरोह और अपराधियों की सुनियोजित गतिविधियां काम करती हैं। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय को अत्यंत गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या इन घटनाओं के पीछे कोई देशव्यापी गिरोह सक्रिय है या फिर यह अलग-अलग राज्यों की स्थानीय समस्या है। अदालत का मानना है कि जब तक समग्र डेटा एकत्र कर उसका वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया जाएगा, तब तक समस्या की वास्तविक प्रकृति समझना संभव नहीं होगा।
लापता बच्चों के मामलों में एक बड़ी चुनौती विश्वसनीय आंकड़ों की कमी है।
कई बार राज्यों द्वारा समय पर जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माण प्रभावित होता है। यदि सभी राज्यों का डेटा एकीकृत रूप में उपलब्ध हो, तो यह पता लगाया जा सकता है कि किन क्षेत्रों में जोखिम अधिक है, किन आयु वर्ग के बच्चे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं और अपराधियों के काम करने का तरीका क्या है। न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया है कि बरामद किए गए बच्चों से व्यवस्थित पूछताछ की जाए ताकि यह समझा जा सके कि उन्हें कैसे बहलाया-फुसलाया गया, किसने उन्हें ले जाया और वे किन परिस्थितियों से गुजरे। इस तरह की जानकारी भविष्य में अपराध रोकने के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है।
इस समस्या के पीछे कई गहरे सामाजिक-आर्थिक कारण हैं। गरीबी आज भी बच्चों की असुरक्षा का सबसे बड़ा कारण मानी जाती है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार अक्सर बेहतर जीवन या रोजगार के लालच में बच्चों को शहरों या दूसरे राज्यों में भेज देते हैं, जहां वे तस्करों के जाल में फंस सकते हैं। अशिक्षा भी एक महत्वपूर्ण कारक है, क्योंकि जागरूकता की कमी के चलते अभिभावक संभावित खतरों को पहचान नहीं पाते।
बेरोजगारी, ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन, पारिवारिक विघटन और सामाजिक भेदभाव भी बच्चों को अधिक संवेदनशील बना देते हैं। विशेष रूप से दलित और आदिवासी समुदायों के बच्चे कई बार अधिक जोखिम में पाए जाते हैं क्योंकि उनके परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर होते हैं।
मानव तस्करी इस समस्या का सबसे भयावह पहलू है। कई मामलों में बच्चों को जबरन मजदूरी, घरेलू काम, भीख मंगवाने, अवैध गोद लेने या यौन शोषण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अपराधी अक्सर बच्चों को झूठे वादों, नौकरी के बहाने या बेहतर शिक्षा के नाम पर अपने साथ ले जाते हैं। कुछ मामलों में किशोर-किशोरियां घर से भाग भी जाते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों को भी गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि घर से भागे बच्चे अपराधियों के आसान निशाने बन जाते हैं। आज डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग ने अपराधियों को नए अवसर दिए हैं; सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए वे बच्चों से संपर्क स्थापित कर उन्हें अपने जाल में फंसा सकते हैं।
भारत में बाल तस्करी और अपहरण रोकने के लिए कई कानून मौजूद हैं। संविधान मानव तस्करी पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाता है और विभिन्न आपराधिक तथा बाल संरक्षण कानून इस अपराध के खिलाफ कठोर दंड का प्रावधान करते हैं। इसके बावजूद सबसे बड़ी समस्या इन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन की है। कई बार जांच में देरी, पुलिस बल की कमी, राज्यों के बीच समन्वय का अभाव और लंबी न्यायिक प्रक्रिया अपराधियों को बच निकलने का अवसर दे देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना अधिक जरूरी है।
सरकार ने समय-समय पर लापता बच्चों को खोजने के लिए विशेष इकाइयों, हेल्पलाइन सेवाओं और ऑनलाइन पोर्टलों की शुरुआत की है, जिनका उद्देश्य शिकायत दर्ज करना आसान बनाना और खोज अभियान को तेज करना है। एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स जैसी पहलें भी की गई हैं ताकि संगठित गिरोहों पर प्रभावी कार्रवाई हो सके। फिर भी इन प्रयासों को और मजबूत करने की आवश्यकता है। पुलिस, रेलवे, सीमा सुरक्षा एजेंसियों और बाल कल्याण समितियों के बीच बेहतर तालमेल इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सामाजिक जागरूकता भी इस समस्या से निपटने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा के प्रति सतर्क रहना चाहिए और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना देनी चाहिए। स्कूलों में बच्चों को सुरक्षा संबंधी शिक्षा देना, अजनबियों से सावधान रहने की सीख देना और डिजिटल दुनिया के खतरों से अवगत कराना भी जरूरी है। स्थानीय समुदाय, स्वयंसेवी संगठन और नागरिक समाज यदि सक्रिय भूमिका निभाएं, तो कई घटनाओं को होने से पहले रोका जा सकता है।
लापता बच्चों की बरामदगी के बाद उनका पुनर्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई बच्चे शारीरिक और मानसिक आघात से गुजरते हैं, इसलिए उन्हें मनोवैज्ञानिक सहायता, शिक्षा और सुरक्षित वातावरण प्रदान करना आवश्यक है। यदि पुनर्वास की प्रक्रिया मजबूत नहीं होगी, तो बच्चे दोबारा शोषण के शिकार हो सकते हैं। इस दिशा में दीर्घकालिक योजनाएं बनाना समय की मांग है।
तेजी से बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में बच्चों की सुरक्षा केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं रह गई है; यह सरकार, समाज और हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। एक मजबूत डेटा प्रणाली, राज्यों के बीच प्रभावी सहयोग, आधुनिक तकनीक का उपयोग, त्वरित जांच और कठोर दंड व्यवस्था,ये सभी मिलकर ही इस समस्या पर नियंत्रण पा सकते हैं। यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो लापता बच्चों की बढ़ती संख्या देश के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना दरअसल राष्ट्र के भविष्य की रक्षा करना है, क्योंकि सुरक्षित बचपन ही एक सशक्त और विकसित समाज की आधारशिला होता है!-
सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र